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इतिहास बचायें या वर्तमान बनाते हुए भविष्य की सोचें?

!! जय माता जी री सा !!
जी हाँ..
आज के ब्लॉग का मुद्दा यही तय हुआ है..
मेरे ब्लॉग के मुद्दे ज्यादातर जनता ही तय करती है..और आज का मुद्दा है "इतिहास बचायें या वर्तमान बनाते हुए भविष्य की सोचें..??"
इतिहास को लेकर मेरी सोच ये है कि "इतिहास एक ऐसी चीज है जिसे हर व्यक्ति अपनी मर्जी के अनुसार तोड़ मरोड़कर पेश करता है"
सबसे पहली और जरूरी बात कि मैं जातिवाद पर बोलना-लिखना पसंद नहीं करता, क्योंकि मेरे लिए जाति से ज्यादा व्यक्तित्व महत्व रखता है..पर आज लिखना पड़ रहा है इसिलिए इस पर लिख रहा हूँ..
मैं एक "राजस्थानी" हूँ..और राजस्थान के "चारण समाज" से हूँ, जिनकी कुलदेवी "माँ करणी जी" है..
भारतीय इतिहास में चारणों को देवीपुत्र/कविवर/कविराज के तौर पर जाना जाता रहा है, जो कि अपने शब्दों से बड़े-बड़े राजाओं को जोश से भर देते थे, और अपने शब्दों के वार से घमंडी राजाओं का घमंड भी उतार देते थे |
राजस्थान का एक बड़ा समाज है "राजपूत समाज", उनकी भी कुलदेवी माँ करणी जी ही हैं, और ये समाज राजस्थान पर राज करने वाले समाज के तौर पर जाना जाता है..
इसिलिए पहले राजस्थान का नाम "राजपूताना" ही था, क्योंकि शुरूआत से ही इस पर राजपूत शासकों का राज रहा है..
तो तब से ही राजपूतों और चारणों का आपसी जुगलबंदी शुरू हो गई थी..जो आज भी जारी है..
आज भी जब कहीं पुरूषों में राजपूत और चारण एक साथ खाना खाने के लिए बैठतें है तो राजपूत तब तक निवाला नहीं तोड़ते जब तक चारण ना तोड़े..
और महिलाओं में बुजुर्गों के पाँव छूने का रिवाज हमारे यहाँ आज भी है परन्तु कभी भी कोई राजपूत समाज की महिला( भले वो कितनी ही वृद्ध हों) किसी चारण महिला को अपने पैर नहीं छूने देती..क्योंकि राजपूत महिलाऐं, चारण महिलाओं का सम्मान करती है और देवीतुल्य मानती है..तो चारण-राजपूत समाज का हमारे यहाँ कुछ ऐसा रिश्ता है..इसिलिए चारण-राजपूत एक ना होकर भी एक ही माने जातें हैं..
इसिलिए मुझे थोड़ा तो हक है कि मैं अपने समाज के बारे में कुछ लिख कर लोगों को इससे अवगत कराऊं, खासकर अपने ही समाज से..
तो आपको मैने अपने समाज से पुरखों के कमाये इतिहास से परिचय करवा दिया है, अब इसके कड़वे वर्तमान और इसी हिसाब से चलते रहे तो इसके आने वाले अन्धकारमय भविष्य से भी अवगत करवाना जरूर चाहूँगा..
आज चारण समाज जिस एक कैंसर रूपी बीमारी से जूझ रहा है वो है "टीका प्रथा" यानि वो कुरीति जिसे प्रथा या आशीर्वाद रूपी घूंघट में ढका जा रहा है..
इस "टीका प्रथा" का असली चेहरा तो ये है कि ये दहेज के लालची दूल्हा पक्ष की रूपयों के प्रति भूख को दर्शाता है और अधिक घिनौने रूप में कहूँ तो इस कुरीति का सच्चा अर्थ "लड़के की सरेआम नीलामी" करना है.... जी हाँ नीलामी और वो भी लड़के के माँ-बाप द्वारा खुलेआम मुँह फाड़कर मांगी गई Base prize के साथ नीलामी शुरू होती है..
Base prize का आंकड़ा लड़के की सरकारी नौकरी के ओहदे के proportionaly बढता जाती है..
Example: SSC CGL Selected लड़के की Base prize 25-30lakh, RAS- 30-40lakh, IAS- 50-60Lakh Rupees..
और ये रकम तब और बढ़ जाती है जब लड़का इकलोता हो और परिवार सम्पन्न और सामाजिक पैठ रखता हो!
तो ये है वास्तविकता...
और हाँ आजकल तो अपवाद भी दिखने लगे हैं..कई जगह बेरोजगारों के लिए भी "टीका माँगा" जाने लगा है..
सबसे शर्मिंदगी की बात ये है कि आज के युवा इसे ले भी लेते हैं..इतने ऊंचे पदों पर बैठकर भी वो इन सामाजिक बुराईयों की बेड़ियाँ तोड़कर मिशाल कायम नहीं करते अपितु इस दौड़ को बढावा देते है..
फिर इस बुराई को ढकने के लिए इसे ये ढाल दी गई कि ये तो लड़की के पिता द्वारा उसकी बेटी को दिया गया Cash आशीर्वाद है और जवाईं को दिया गया Gift है..
अरे, कभी जाकर उस बाप से पूछना कि किस तरह उसने तुम्हारे पैसे की भूख मिटाने की कोशिश में ये रकम जुटाई है..वो भी अपनी बेटी को कोई तकलीफ ना हो, बेटी को ससुराल में सुनना ना पड़े सिर्फ इसिलिए..
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ये टीका कुप्रथा कन्या भ्रूण हत्या का एक बड़ा कारण बन गई है हमारे समाज में..
और जिस दिन चारण समाज इस बुराई को जड़ से मिटा देगा उस दिन मैं गर्व से कह सकूँगा कि हाँ चारण हूँ मैं..
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अब बात करतें हैं राजपूत समाज की..उनके पूर्वजों ने राजस्थान पर कई वर्षों तक गौरवपूर्ण तरीके से राज किया और राजपूताना का ध्वज आसमान में लहरा दिया..जिस समाज में अनेकानेक पराक्रमी, शूरवीर योद्धा यहाँ पैदा हुए जिनका इतिहास आज भी रोमांचित कर देता है और जोश भर देता है..ये तो हुआ इनका इतिहास..
अब राजपूतों का वर्तमान कुछ इस तरह का है कि उनके समाज के एक बहुत बड़े हिस्से पर आजतक अपने पुरखों का नशा इस तरह छाया है कि इस चक्कर में अपना वर्तमान और भविष्य दोनों पर सवालियां निशान लिए घूम रहे हैं!!..
राजपूत समाज को करीब से देखा है इसिलिए लिख पा रहा हूँ कि जिस गौरवशाली इतिहास को लेकर उन्हें जोश से आगे बढते रहना चाहिए था उसके बजाय वो पुरखों के इतिहास को अभी वर्तमान में भी जी रहें हैं और अपना तथा आने वाली पीढियों का भविष्य बर्बादी की तरफ ले जा रहें हैं..
एक कारण यह भी है कि राजपूत समाज राजस्थान के शासकों का समाज रहा है तो इसे आरक्षण से वंचित रखा गया है, जिसके कारण युवाओं को नौकरी नहीं मिल रही, जोकि अवसाद का एक कारण बन रहा है!
अब जिस समाज के जिम्मे अपने पूर्वजों की इज्जत का स्तर बरकरार रखने का मौका मिला वो खुद नशेखोरी, गुंडागर्दी की चपेट में आ गया..जिसके कारण कई परिवार और कई पीढियां बर्बाद हो गई या बर्बादी की कगार तक पहुँच गयीं..और इस नशाखोरी नामक बुराई को भी "बन्नागिरी" की चमक ओढाकर ढक दिया गया..कि अगर राजपूत हो और नशा नहीं किया तो तुम असली बन्ना नहीं हो..
नशाखोरी को समाज का गौरव बताया जा रहा है..नशे की इमेज ऐसी बनाई जा रही है..जो कि पीढियां-परिवार बर्बाद कर रही हैं..और इस पर कोई सोच ही नहीं रहा..
आज इस मुद्दे की चर्चा का कारण यह कि आज चारणों और राजपूतों की कुलदेवी माँ करणी जी के नाम पर बनी एक इतिहास सरंक्षक स्वयंघोषी सेना "करणी राजपूत सेना" ने फिल्मनिर्माता "संजय लीला भंसाली" को उनकी आने वाली फिल्म "पद्मावती" की कहानी पर इतिहास से छेड़छाड़ का आरोप लगाकर राजधानी जयपुर में उनकी पिटाई कर दी |
ये बिल्कुल गलत है और राजपूत समाज की आड़ लेकर लोग राजनीतिक खेल खेल रहें हैं..जिनकी वजह से ना सिर्फ राजपूत समाज बल्कि पूरे राजस्थान को शर्मिंदा होना पड़ रहा है!
.मैं राजपूत समाज को अच्छे से जानता हूं क्योंकि उन्ही से हूँ..जो आज इस सेना ने किया है वो शर्मनाक है!
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मेरे उन इतिहास सरंक्षक सेनानायकों से कुछ सवाल हैं..
1.आपकी इस सेना की उत्पत्ति, उद्देश्य, आवश्यकता और प्रमाणिकता क्या है??
2.किसने आपको अधिकार दिया कि इतिहास सरंक्षण के नाम पर आप खुलेआम हिंसा करते घूमेंगे??
3.आपको फिल्म के बनने से पहले फिल्म की पूरी कहानी पता चल गई क्या??
4.आपकी सेना के पदाधिकारी क्या फैसले लेने लायक सामर्थ्य और इतिहास का ग्यान रखतें है कि वो बता सकें सही इतिहास क्या है??
5.अब तक वो सेना किस तरह के काम करती आयी है और उसके सैनिक किस तरह का सामाजिक पृष्ठभूमि रखतें हैं??
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एेसी सेनाऐं आजकल देश में बहुत घूम रहीं है..जिनके कर्ताधर्ता बाहुबली,माफिया,गुंडे होते हैं और सेनाओं की आड़ में गुंडागर्दी चलातें हैं|
राजस्थान यूँ ही भारत के पिछड़े राज्यों में आता हैं फिर चाहे राजस्थानी फिल्म इंडस्ट्री हो, राजस्थानी भाषा हो, शिक्षा हो, रोजगार हो, सबमें तो हमारे नेताओ की कृपा से नैया डूबी ही पड़ी है. फिर ऐसे असामाजिक तत्व टूरिज्म को भी बर्बाद कर देते है!
जिस दिन ये सेनाऐं समाज की बुराईयों के खिलाफ आवाज उठायेंगी तब मैं इनका साथ दूँगा!
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मेरी ये सोच नहीं है कि सभी चारण टीका प्रथा के अनुपालक है या सभी राजपूत नशाखोरी की चपेट में हैं..पर मेरा उद्देश्य ये है कि हमारे समाज का एक भी व्यक्ति इन बुराईयों की बेड़ियों से ना जकड़े.
बल्कि ऐसी बुराईयों से खुद को दूर करके.. अपने आप को और परिवार को एक शानदार वर्तमान और सुनहरा भविष्य दे!

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इस ब्लॉग को पढने का शुक्रिया..मेरा इरादा आपको या आपके समाज को ठेस पहुँचाने का कतई नहीं है वरन् मैं तो समाज को बुराईयों और कुरीतियों से समाज का सामना करवाने की कोशिश कर रहा हूँ..फिर भी आपको बुरा लगे तो मन से माफ करें..
आपकी अनमोल राय का इंतजार रहेगा ..पर एक बार अपने-अपने समाज में व्याप्त बुराईयों के बारे में बैठकर सोचिएगा और परिवार में चर्चा कीजिएगा!
धन्यवाद!! खम्मा घणी !!

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